विपक्ष ने चाहा इस्तीफा तो इंदिरा ने भेजा जेल, ऐसे बन गए इमरजेंसी के हालात

आमतौर पर चुनाव याचिकाएं फैसला होने तक निरर्थक हो जाती हैं. अदालतें जब तक नतीजे तक पहुंचती हैं , निर्वाचित जन प्रतिनिधि और सदन का कार्यकाल पूरा हो चुका होता है. इस याचिका के निपटारे के वक्त तक भी लोकसभा के कार्यकाल के चार वर्ष बीत चुके थे. सिर्फ साल भर बाकी था. लेकिन राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी मामले में अदालत के इस फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था. समूचा विपक्ष जेल भेज दिया गया. नागरिकों के मूल अधिकार निलंबित कर दिए गए. अदालतें पंगु हो गईं. देश आंतरिक आपातकाल के डर से परिचित हुआ. पहली बार लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया. क्यों ये सब हुआ था?

बड़ी वजह थी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का 12 जून 1975 का वो फैसला जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली से निर्वाचन को रद्द कर दिया था. पहले से ही आंदोलित विपक्ष ने अदालत के फैसले के बाद प्रधानमंत्री पद से इंदिरा गांधी के इस्तीफे के लिए दबाव बढ़ा दिया था. 12 जून 2025 को उस फैसले के पचास साल पूरे हो गए हैं. सांझ की ओर बढ़ती उस दौर की पीढ़ी की यादों में आज भी फैसले के नतीजे कौंधते हैं. बाद की पीढ़ियों में कुछ ने उसके विषय में सुना है. आम तौर पर लोग अनजान है. क्या था वो फैसला? पढ़िए उसकी पूरी कहानी.

1971 के नतीजों ने गैरकांग्रेसी विपक्ष को किया पस्त

1967 में नौ राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के बाद विपक्ष के हौसले बढ़े हुए थे. 1971 में विपक्ष के महागठबंधन ने कांग्रेस को चुनौती दी थी. बैंकों के राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रीवियर्स के खात्मे और गरीबी हटाओ के नारे के साथ इंदिरा गांधी अपने प्रगतिशील कदमों के कारण लोकप्रियता के शिखर पर थीं. विपक्ष ने रायबरेली में उनका मुकाबला करने के लिए जुझारू सोशलिस्ट नेता राजनारायण को चुनाव मैदान में उतारा था.

राजनारायण का सड़कों से सदन तक का संघर्ष का इतिहास था. लेकिन इंदिरा के सामने चुनावी संघर्ष में वे टिक नहीं पाए थे. इस चुनाव में इंदिरा गांधी को1,83,309 और राजनारायण को 71,499 वोट मिले थे. 1967 में अविभाजित कांग्रेस को लोकसभा की 283 सीटें हासिल हुईं थीं. 1969 में पार्टी का ऐतिहासिक विभाजन हुआ. बावजूद इसके इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने 1971 में 352 सीटें जीतकर विपक्ष को पस्त कर दिया था.

Raj Narain

राजनारायण का सड़कों से सदन तक का संघर्ष का इतिहास था.

तब बैलेट पेपर से थी शिकायत

वो बैलेट पेपर के जरिए होने वाले चुनावों का समय था. कांग्रेस के साथ समाजवादी और अन्य कई दल इन दिनों ईवीएम की जगह बैलेट पेपर की वापसी की मांग कर रहे हैं. लेकिन 1971 के चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त जीत को सोशलिस्ट सहित गैरकांग्रेसी विपक्ष ने बैलेट पेपर पर “अदृश्य स्याही” के इस्तेमाल से हुए घपले की जीत बताया था.

राजनारायण ने अपने अधिवक्ता रमेश चंद्र श्रीवास्तव के जरिये इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा गांधी का रायबरेली से निर्वाचन रद्द करने की याचिका प्रस्तुत की थी. याचिका में मुख्य आरोप मतपत्रों में अदृश्य रसायन के प्रयोग का था. भ्रष्ट आचरण के आरोप सहायक मुद्दों के तौर पर दर्ज थे.बाद मे राजनारायण ने शांतिभूषण को अपना एडवोकेट नियुक्त किया. शांतिभूषण ने इस शर्त पर मामले को हाथ में लेने की अपनी स्वीकृति दी कि मुकदमा प्रचार के लिए नहीं बल्कि गम्भीरता से लड़ा जाएगा.

उन्होंने मतपत्रों पर अदृश्य रसायन के उपयोग को आधारहीन मानते हुए किनारे कर दिया. चुनाव में इंदिरा के पक्ष में भ्रष्ट आचरण के आरोपों को इतना विकसित किया कि वे निर्णय के केंद्र में आ गए.

पहला मुकदमा जिसमें प्रधानमंत्री बतौर गवाह पेश

शुरुआत में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के सामने इस मुकदमें की दलीलें पेश करने के दौरान शांतिभूषण ने अनुभव किया था कि सिन्हा सुनवाई में खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. अपनी आत्मकथा Courting Destiny में शांतिभूषण ने लिखा, “लेकिन तीसरे दिन से जब वे नोट्स लेने लगे, तब मुझे आभास हुआ कि वे इसे गम्भीरता से ले रहे हैं.’

इंदिरा के वकीलों की टीम की अगुवाई सीनियर एडवोकेट सतीश चंद्र खरे ने की थी. दोनों ओर से इस मामले में तैंतीस दिनों तक दलीलें पेश की गईं थी. यह पहला मुकदमा था जिसमें देश का कोई प्रधानमंत्री बतौर गवाह पेश हुआ. जस्टिस सिन्हा का निर्देश था कि गवाह के तौर अदालत में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रवेश के समय कोई खड़ा नहीं होगा. हालांकि, इंदिरा गांधी के लिए कुर्सी लगाई गई थी. शांतिभूषण ने पूरी विनम्रता के साथ दो दिन उनसे जिरह की थी. अदालत ने इंदिरा गांधी के जवाबों को विरोधाभासी मानते हुए उनकी गवाही को भरोसेमंद नहीं माना था.

Indira Gandhi Ex Pm

राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी मामले में अदालत के इस फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था.

ये थे आरोप

मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत के बाहर भी जबरदस्त गहमागहमी थी. यह अखबारों का जमाना था. अखबार मुकदमे की कार्यवाही को खूब कवरेज दे रहे थे. राजनेताओं के साथ ही अखबार पढ़ने वालों की इससे जुड़ी खबरों में खूब दिलचस्पी थी. बैलेट पेपर पर अदृश्य रसायन के प्रयोग का आरोप ओझल हो चुका था. अदालत को तय करना था- क्या इन्दिरा गांधी ने यशपाल कपूर की तब सेवाएं ली थीं जब वे राजपत्रित अधिकारी थे? रिकॉर्ड के मुताबिक, कपूर के इस्तीफे को राष्ट्रपति ने 25 जनवरी 1971 को पूर्वगामी तिथि 14 जनवरी से स्वीकार किया था. अदालत को पूर्वगामी तिथि से इस्तीफे की स्वीकार्यता की वैधता का बिंदु भी निर्णीत करना था.

दूसरा सवाल था कि क्या इंदिरा गांधी 1 फरवरी, 1971 के पूर्व स्वयं को रायबरेली से उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत कर रहीं थीं? अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 29 जनवरी 1971 को उनकी उम्मीदवारी को मंजूरी दी. राजनारायण के अनुसार 29 दिसम्बर 1970 को लोकसभा भंग होने के साथ ही इंदिरा गांधी खुद को उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत कर रहीं थीं. इस बिंदु का आधार लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 का उस समय का वो प्रावधान था, जिसके अनुसार एक व्यक्ति तभी उम्मीदवार बन जाता है, जब सामाजिक तौर पर स्वयं को इस रूप में प्रस्तुत करने लगता है.

प्रधानमंत्री की सभाओं के लिए मंच निर्माण, शामियाने, बिजली, माइक्रोफोन की व्यवस्था, सशस्त्र बलों का प्रयोग और इनके जरिए चुनाव प्रचार को प्रभावी बनाने का मुद्दा भी अदालत के सामने विचाराधीन था. निर्दलीय प्रत्याशी स्वामी अद्वैतानंद को आर्थिक मदद, मतदाताओं को रजाई, कम्बल, धोती, शराब वितरण और तय सीमा पैंतीस हजार रुपये से अधिक खर्च करने के भी सवाल याचिका में उठाये गए थे.

माफिक फैसले के लिए जस्टिस सिन्हा पर इंदिरा का दबाव

यह सामान्य मुकदमा नहीं था. विपरीत निर्णय का सीधा असर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पड़ता. उन दिनों गुजरात में छात्रों का नवनिर्माण आंदोलन उफान पर था. गफूर सरकार की बर्खास्तगी की मांग को लेकर बिहार के छात्र सड़कों पर थे. जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में चल रहे संपूर्ण क्रांति आंदोलन की तपिश देश के अन्य राज्यों में महसूस की जा रही थी. ऐसे माहौल में इंदिरा गांधी के खिलाफ अदालती फैसला उनकी समस्याएं बढ़ा सकता था.

इंदिरा गांधी के समर्थक इस दिशा में सक्रिय थे. शांति भूषण ने अपनी किताब में दावा किया है कि जस्टिस सिन्हा को अनुकूल निर्णय देने के लिए सुप्रीमकोर्ट की जस्टिसशिप का प्रलोभन दिया गया. प्रशांत भूषण की किताब ,’ द केस दैट शुक इंडिया ‘ के अनुसार छुट्टियों के एकांत में जस्टिस सिन्हा घर पर फैसला लिखना चाहते थे. लेकिन तब रोज ही शाम को इलाहाबाद के एक सांसद उनके घर पहुंचने लगे. बाद में सिन्हा को उन्हें मना करना पड़ा. वे तब भी नहीं माने तो जस्टिस सिन्हा ने पड़ोसी जस्टिस पारिख की सहायता ली. उस दौरान उन्होंने घर के बरामदे में भी आना बंद कर दिया और आने वाले लोगों को बताया गया कि जस्टिस सिन्हा अपने भाई के यहां उज्जैन गए हुए हैं.

फैसले के कुछ महीनों बाद कुलदीप नैयर से भी जस्टिस सिन्हा ने सांसद के जरिये उन्हें अनुकूल करने की कोशिश का जिक्र किया था. प्रशांत भूषण के मुताबिक जस्टिस सिन्हा पर जुलाई तक फैसला टालने का दबाव चीफ जस्टिस डी. एस. माथुर के जरिये डाला गया. जस्टिस माथुर ने देहरादून से उन्हें फोन करके ऐसा करने के लिए कहा. इन कोशिशों ने जस्टिस सिन्हा को खिन्न कर दिया. वो फैसला लिखा चुके थे. उन्होंने फैसले की तारीख 12 जून 1975 निश्चित कर दी.

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